मेरी मां


                             "मां"
"मां" री गाथा पूरी लिख नहीं पाऊं, पण हिवडे सु आवाज आई शब्दा ना जोड़, क्यों ना एक कविता 
"मां" पर ही बनाऊं! 
"मां" रो दरजो भगवान सु ऊंचो ,"मां" धीरज री खान है। गुरू,ज्ञान देवे जद भी बोले,"मां" री महिमा महान हैं।

"मां" जिस्यो कोई अनमोल कोनी, यो बात जाने सगलो संसार हैं


 
"मां" जन्म री दाता म्हारी ,पाल पोशकर बड़ी करी। 
एक बार जे झिरक देवे तो, "मां" ही बारंबार पुचकारी है।पिता री रोष रो डर दिखाव,पण बांका गुस्सा सु फेरू"मां" ही बचाव है। 
गुरु, पोथी रो ज्ञान देवे,  पण "मां" री शिक्षा जीवन भर काम आव है। 
"मां" तावरा री ठंडी छाया ,मां ही ज्ञान-विज्ञान और सम्मान है।
"मां" अंधेरा रो उजालो, मां ही मुश्किल घड़ी में बुलंद हौसला री पहचान है। 
"मां" धरती सी सौर्य सरीखी, मां ही चारों धाम है। 
"मां" रो आशीष कवच ही, हर संकट न पर करावा है।
हर "मां "शब्द अपने आप में पावन है, मेरो रोम रोम यो कहलवा है।
                                        मनीषा मारू

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